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“महिला प्रेम में चर्चित IPS साहब की ‘कप्तानी वाली प्रेम कहानी’ अधूरी रह गई!”


➡️ कप्तानी की चाह, सत्ता के दरबार और विवादों में घिरा एक आईपीएस अफसर..! 

➡️ सत्ता के दरबार से एसपी बंगले तक… चर्चाओं में घिरा आईपीएस..! 

➡️ पोस्टिंग की राजनीति में उलझा एक ‘रोमांटिक’ आईपीएस..! 
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 सत्ता के दरबार में हाज़िरी लगाकर जिले की कुर्सी पाने का सपना देखने वाले एक विवादित आईपीएस अफसर को इस बार बड़ा झटका लगा। निजी रिश्तों, विवादित कार्यशैली और लॉबिंग के किस्सों से घिरे इस अफसर की तमाम कोशिशों पर आखिरकार विभाग ने ब्रेक लगा दिया। 
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भोपाल। मध्य प्रदेश पुलिस महकमे में हाल ही में जारी हुई आईपीएस तबादला सूची के बाद एक ऐसे अधिकारी की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है, जिन्हें पूरा भरोसा था कि इस बार उन्हें फिर किसी जिले की कप्तानी मिल जाएगी। राजधानी की एक बटालियन में सेनानी पद पर पदस्थ यह अधिकारी लंबे समय से राजनीतिक गलियारों में सक्रिय बताए जाते रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, तबादला सूची जारी होने से पहले उक्त आईपीएस अधिकारी लगातार सत्ता से जुड़े नेताओं और प्रभावशाली लोगों के संपर्क में रहे। विभागीय चर्चाओं में यह तक कहा जाता रहा कि वह नेताओं के दरबार में जाकर जी-हुजूरी करने और अपनी पोस्टिंग के लिए हरसंभव प्रयास करने में जुटे थे। उन्हें विश्वास था कि राजनीतिक पकड़ के दम पर इस बार फिर किसी बड़े जिले की कमान मिल जाएगी।

लेकिन जब सूची जारी हुई तो उन्हें कप्तानी नहीं मिली। पुलिस मुख्यालय के सूत्रों की मानें तो डीजी स्तर पर उनकी कार्यशैली, छवि और पुराने विवादों को देखते हुए उन्हें फील्ड में एसपी बनाए जाने के लिए उपयुक्त नहीं माना गया। विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच भी उनकी कार्यप्रणाली को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।

सूत्र बताते हैं कि जब सूची जारी होने के बाद अधिकारी को यह अहसास हुआ कि उनका नाम कप्तानी के लिए नहीं आया है और बुरहानपुर जिला अभी खाली है, तब उन्होंने आखिरी समय में फिर राजनीतिक संपर्कों का सहारा लेने की कोशिश की। चर्चा है कि वह सुबह करीब 9 बजे एक बड़े माननीय के दरवाजे तक पहुंच गए और हर स्तर पर जोर लगाने की कोशिश की गई, लेकिन इस बार भी उनका पूरा प्लान फेल हो गया। बताया जाता है कि डीजी स्तर पर स्पष्ट संदेश था कि विवादित छवि और संदिग्ध कार्यप्रणाली वाले अधिकारी को फिलहाल फील्ड की जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी।

बताया जाता है कि उक्त अधिकारी मूलतः राजस्थान के जयपुर के रहने वाले हैं। विभाग में उनकी पहचान एक स्मार्ट और प्रभावशाली बॉडी लैंग्वेज वाले अफसर के रूप में जरूर रही, लेकिन उनके निजी आचरण और चरित्र को लेकर हमेशा चर्चाएं होती रहीं।

सूत्रों के अनुसार, जब वह पुलिस मुख्यालय में पदस्थ थे, तब मीडिया सेंटर में कार्य देखने वाली एक युवती के साथ उनके संबंधों को लेकर काफी चर्चाएं हुई थीं। जबकि अधिकारी पहले से शादीशुदा थे और उनका पारिवारिक जीवन सामान्य माना जाता था। आरोप यह भी लगे कि बाद में जब उन्हें बालाघाट जिले की कप्तानी मिली, तब उक्त युवती को एसपी बंगले में रखा गया। इस पूरे मामले को लेकर विभाग के अंदर काफी नाराजगी और चर्चा रही।

जानकारी के मुताबिक, जब इस संबंध की जानकारी उनकी पत्नी को लगी तो उन्होंने विभागीय स्तर पर शिकायत भी की। हालांकि मामला बाद में दब गया और किसी प्रकार की बड़ी कार्रवाई सामने नहीं आई। इन घटनाओं ने अधिकारी की व्यक्तिगत छवि पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

सिर्फ निजी जीवन ही नहीं, बल्कि उनके कार्यकाल को लेकर भी कई तरह के आरोप सामने आते रहे हैं। उक्त अधिकारी को श्योपुर, भिंड और बालाघाट जैसे जिलों की कप्तानी मिल चुकी है। विभागीय चर्चाओं में अक्सर यह आरोप लगाए जाते रहे कि इन जिलों में उनके कार्यकाल के दौरान अवैध कारोबारों को संरक्षण मिला।

श्योपुर में पदस्थापना के दौरान जमीन संबंधी मामलों में सौदेबाजी, रेत और शराब के अवैध कारोबार को संरक्षण देने जैसी बातें चर्चा में रहीं। वहीं भिंड में अवैध रेत कारोबार को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि शिकायतें सीधे मुख्यमंत्री स्तर तक पहुंचीं और अंततः उनसे कप्तानी वापस ले ली गई।

इसके बाद उन्हें बालाघाट जिले की जिम्मेदारी मिली, लेकिन वहां भी हालात नहीं बदले। सूत्रों का दावा है कि कुछ ही महीनों में अवैध रेत कारोबार फिर सक्रिय हो गया और छत्तीसगढ़ तक सप्लाई की चर्चाएं होने लगीं। वहीं निजी जीवन को लेकर भी एसपी बंगले से जुड़ी चर्चाएं लगातार विभागीय हलकों में तैरती रहीं।

पुलिस महकमे के जानकारों का कहना है कि किसी अधिकारी की जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था संभालना नहीं होती, बल्कि उसका व्यक्तिगत आचरण और सार्वजनिक छवि भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यही वजह है कि इस बार तमाम राजनीतिक कोशिशों, लॉबिंग और सत्ता के दरबार में हाजिरी लगाने के बावजूद उन्हें फील्ड पोस्टिंग के लिए फिट नहीं माना गया।

हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पुलिस और प्रशासनिक गलियारों में यह मामला लंबे समय से चर्चा का विषय बना हुआ है। तबादला सूची ने एक बार फिर यह संदेश जरूर दे दिया कि केवल राजनीतिक पहुंच ही किसी अधिकारी के लिए पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उसकी कार्यशैली, ईमानदारी और चरित्र भी बड़े पैमाने पर मायने रखते हैं।

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