➡️ हॉक फोर्स से लौटते ही मिली पसंदीदा पोस्टिंग, उठे कई सवाल..!
➡️ क्या राजनीतिक सिफारिश और 'कमिटमेंट' से तय हुई तैनाती..!
➡️bयोग्यता या जुगाड़? पोस्टिंग सिस्टम पर फिर खड़े हुए सवाल..!
➡️ ईमानदार डीजीपी, लेकिन क्या व्यवस्था पर हावी है 'पोस्टिंग लॉबी'..!
शहर सूत्र भोपाल। मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय से शनिवार शाम जारी राज्य पुलिस सेवा (डीएसपी स्तर) के तबादला आदेश के बाद एक बार फिर पोस्टिंग प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सबसे अधिक चर्चा दो अधिकारियों—डीएसपी अखिलेश गौर और डीएसपी आशीष पटेल—की पदस्थापना को लेकर हो रही है। आरोप है कि दोनों अधिकारियों ने अपनी पसंदीदा पोस्टिंग हासिल करने के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर प्रभाव का इस्तेमाल किया।
सूत्रों के अनुसार, हॉक फोर्स में सहायक सेनानी के रूप में पदस्थ रहे अखिलेश गौर को सीएसपी कोतवाली, जबलपुर तथा आशीष पटेल को एसीपी खजराना, इंदौर की जिम्मेदारी मिली है। दोनों अधिकारी पहले भी इन्हीं शहरों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं और इन्हें अपनी पसंदीदा जगह माना जाता है।
राजनीतिक सिफारिशों से मिली पोस्टिंग?
सूत्रों का दावा है कि दोनों अधिकारियों ने एक प्रभावशाली राजनेता के माध्यम से पुलिस मुख्यालय में एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी के समक्ष अपनी प्राथमिकता रखी। बताया जा रहा है कि पारिवारिक जिम्मेदारियों का हवाला देकर पसंदीदा स्थान पर पदस्थापना की मांग की गई, जिसे अंततः स्वीकार कर लिया गया।
आशीष पटेल पर क्यों उठ रहे सवाल?
आशीष पटेल इससे पहले इंदौर में एसीपी आजाद नगर रह चुके हैं। आलोचकों का आरोप है कि उनके कार्यकाल के दौरान क्षेत्र में अवैध कारोबार, बार और अन्य व्यवसायों से जुड़ी शिकायतें चर्चा में रही थीं। अब उनकी दोबारा इंदौर में एसीपी खजराना के रूप में वापसी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह भी चर्चा है कि उनकी पत्नी प्रिया पटेल इंदौर जिले में डिप्टी कलेक्टर के पद पर पदस्थ हैं। हालांकि, यह कहना कि केवल इसी कारण उन्हें पोस्टिंग मिली, स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया जा सकता।
अखिलेश गौर की वापसी भी चर्चा में
अखिलेश गौर पहले सीएसपी हनुमानताल में कार्य कर चुके हैं। आरोप लगाए जाते रहे हैं कि उनके कार्यकाल में कबाड़ कारोबार और अन्य अवैध गतिविधियों पर अपेक्षित सख्ती नहीं दिखाई गई। अब उनकी सीएसपी कोतवाली के रूप में नियुक्ति भी सवालों के घेरे में है।
सिस्टम पर उठे बड़े सवाल
पुलिस महकमे के भीतर चर्चा है कि यदि राजनीतिक पहुंच, व्यक्तिगत संपर्क या कथित प्रभाव के आधार पर पसंदीदा पोस्टिंग मिलने लगी, तो उन डीएसपी अधिकारियों का क्या होगा जिनके पास न कोई राजनीतिक संरक्षण है और न ही प्रभावशाली पहुंच?
पुलिस विभाग के कई अधिकारियों का मानना है कि पोस्टिंग पूरी तरह पारदर्शी, योग्यता और सेवा रिकॉर्ड के आधार पर होनी चाहिए, ताकि ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों का मनोबल बना रहे।
डीजीपी की छवि और व्यवस्था पर सवाल
मध्य प्रदेश के डीजीपी कैलाश मकवाना की छवि एक ईमानदार अधिकारी की मानी जाती है। लेकिन विभाग के भीतर यह भी चर्चा है कि यदि अधीनस्थ स्तर पर पोस्टिंग प्रक्रिया में कथित प्रभाव और सिफारिशों की भूमिका बनी रही, तो पूरी व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहेंगे।
यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह केवल दो अधिकारियों की पोस्टिंग का मामला नहीं, बल्कि पूरे पुलिस प्रशासन की पारदर्शिता और निष्पक्षता से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
