➡️महीने की 10 तारीख, 18 लाख और कथित 'हिसाब'... आखिर सच क्या है...!
➡️ईमानदारी के दावों के बीच उठे सवाल, क्या परदे के पीछे कुछ और था...!
➡️लूप लाइन पहुंचने के बाद भी पुराने जिले से क्यों जुड़ रहा है नाम...!
भोपाल। मध्य प्रदेश पुलिस के एक आईपीएस अधिकारी का हाल ही में एक जिले से तबादला कर भोपाल की लूप लाइन में पदस्थ किया गया। लेकिन सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि साहब का उस जिले से मोह अभी भी खत्म नहीं हुआ है।
विश्वसनीय सूत्रों का दावा है कि तबादले के बाद भी अधिकारी अपने कार्यकाल के दौरान होने वाली कथित 'कलेक्शन' का हिसाब मांग रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, उनका कहना है कि "जिस अवधि तक मैं एसपी था, उस समय का हिसाब मेरा है।" इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
बताया जाता है कि संबंधित जिले में खनन और कबाड़ का कारोबार बड़े पैमाने पर होता है। सूत्रों का आरोप है कि इसी कारोबार से हर महीने 18 लाख रुपये की कथित अवैध वसूली होती थी। और महीने के 10 तारीख को भुगतान भी किया जाता था। यह भी दावा किया जा रहा है कि माह पूरा होने से पहले हुए तबादले के कारण कथित भुगतान अटक गया।
सूत्रों के मुताबिक, इसके बाद पुराने सिस्टम को संदेश भेजा गया कि "इस महीने का हिसाब हर हाल में पूरा होना चाहिए।" यहां तक कि कथित तौर पर यह भी कहा गया कि भुगतान नहीं होने पर प्रभावशाली अधिकारियों के माध्यम से कार्रवाई कराई जा सकती है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
चर्चा यह भी है कि कबाड़ कारोबार से जुड़े कुछ लोगों ने पूरा भुगतान करने से इनकार कर दिया, जबकि कुछ ने विवाद से बचने के लिए कथित तौर पर आधी राशि देने पर सहमति जताई। सूत्रों के अनुसार, एक पुलिसकर्मी के जरिए यह राशि भोपाल तक पहुंचाने की भी चर्चा है। इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
जिले में पूर्व एसपी ने खूब ईमानदारी की छाती ठोक रहे थे। जितना ईमानदारी बता रहे थे अंदर से उतने ही गडबड रहे हैं और जिले में अवैध कारोबार बंद ही नहीं हो रहा था, एक दिन मुख्यसचिव ने वीसी लिया और जिले के हालात की समीक्षा की जिसमें एसपी से संतुष्ट नहीं हुए और नाराजगी जताई एसपी साहब को गुमान था कि मेरे मुखिया तो सीएम के खास है लेकिन मुख्यसचिव के सामने नहीं चली और एसपी को निपटा दिया गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि एक अधिकारी का तबादला हो चुका है, तो किसी भी प्रकार की कथित आर्थिक मांग किस आधार पर की जा रही है? यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह केवल एक अधिकारी का मामला नहीं बल्कि पूरे तंत्र की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न है।
यदि सरकार और पुलिस मुख्यालय इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कराते हैं, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। फिलहाल संबंधित अधिकारी का पक्ष उपलब्ध नहीं हो सका है। उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
